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Monday, 1 August 2011

17.

वह आज
देख रही
तिरते बादल

कितनी ही देर
उड़ती रही
पंख पसारे

अपने समंदर में

18.

तुमने
दावा किया

वह आंख
तुम ही थे

प्यासा क्यूँ
मर रहा मन

आजतक

19.

मछली
जल की रानी है

पर समंदर
कब होगा राजा

क्यूँ रूठकर
फिसल गई बांहों से

तेरा प्यार है
जीवन उसका

तेरी म्रत्यु
विरह उसका

20.

बिन जल
मछली ही नहीं
तडपी थी

सारस भी
उड़ न पाए जब

छटपटाए थे हम

21.

वह
देख लेती है
जल के उस पार

चीर सकती है
दुःख
उसका

पर समंदर
समझ न पाया

मन उसका

22.

वह न सोती है
न रोती है

रो लेती थी मै
सो भी लेती थी

उसके आंसू
उसकी नींद

कब आत्मसात
कर सकी मैं

23.

मछली का
विश्वास बड़ा था
उसके पास
समंदर जो था

मेरे विशवास
उसकी तरह
कब हो सकेंगे
गहरे

24.

हर दिन
तैरना
लहराना
गहराना

एक एक पल
समंदर को
कैसे सौंप दिया

तुमने

25.

तू जानने लगी है
मुझे या
स्वयं को

अब कोई आहट
सरसराहट
डराती नहीं
तुझे

पर मैं
अब तक
भयभीत होती रही
किससे

26.

नकली में भी
असली गंध
कैसे पा सकी
वह

कांच की
दीवारें भी
हो गईं सुकून
उसका

हम
'घर' के भीतर
हो न सके
एक मछली



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