Follow by Email

Thursday, 11 August 2011

कुछ कविताएँ

विदा लेने का समय 


तुम अकेले होते ही
अपने संसार में
चले जाते हो

यही प्रतीक्षा है जो
करती हूँ
एक नटी की तरह
तुम्हारा एकाकी होना
बेहतर समय है संतुलन का

कविता में उतरते हो जब
बात करना होता है सहज

रुमानियत को संभाले
अहसासों को पीते हुए
कदम दर कदम
देखती हूँ एक नया संसार

उचित समय होता है
जब तुम रच चुके होते हो
एक कविता
मैं पार कर लेती हूँ रास्ता

विदा लेने का


एक खिडकी खुली रहती है 



मेरी
एक खिडकी खुली रहती है सदा
झांकते हुए कितने ही चेहरे
घर को टटोलते हैं

दरवाजे पर चाहे
लगा गया है सांकल समय
जानबूझकर

अब समंदर पर ताला तो
लग नहीं सकता
उसे भी हक है जानने का कि
खारे और मीठे का अंतर
जाना गया कि नहीं
पहचाना गया कि नहीं

कौन है जो खोलेगा यह द्वार

मैं हूँ कि फेंकती रही हूँ सदा
चाहा अनचाहा इस खिडकी से


आया है संदेसा फिर से 



हर रात में
चमेली महकी थी
सपने खिले थे
हर दिन
रात रानी से झरे थे

कुछ कलियाँ
रह गईं थी बाकी
बहती बयार के हाथ में
एक कहानी सुनी थी
भंवरों कि ज़ुबानी

तितलियों के साथ
संदेसा आया है फिर से


बंजारा है प्यार - 1


किन्ही
अनचीन्ही दिशाओं में
कुछ खोजते रहना
हर कदम
ना आदि ना अंत

रह गए है पगडंडियों पर
क़दमों के आकार
धरती पर सुगंध
आसमान में नीलापन

गाडी में ले जाता है
फूलों के रंग
आँखों के सपने
मन की कुलांचे
हवा की थपकियाँ

और हमारी नींद

अपनी धुन में झूमता गाता
बंजारा है प्यार
चला जा रहा जिसका
ना आदि ना अंत


 बंजारा है प्यार -2




वह बांसुरी बजाता
हर गली हर गाँव से
गुजरता रहा

निकल रही कुछ तान ऐसी कि
समाने लगी अंतस में

घरों से निकल आए
उछालते कूदते
हँसते गाते कितने ही मन

चल दिए पीछे पीछे
फिर दुनिया उनके
पीछे पीछे

ले चला ना जाने
किस दिशा किस देश में

खोजने निकले थे जब
देखा था हर ओर
जहाँ जहाँ
खतरे के निशाँ बने थे






























2 comments:

  1. बहुत ही गहन भावानुभूतियां है, कविताएं कितनी परतें और तहें अपने भीतर समेटे हुए है

    ReplyDelete
  2. सघन संवेदनाएं और सुन्दर अभिव्यक्ति.. बहुत सुन्दर लगी कवितायेँ... बधाई..

    ReplyDelete